आदरणीय महापौर जानकी काटजू नगर की प्रथम नागरिक का सादर अभिवादन

किसी भी महिला का सम्मानित पद पर निर्वाचित होना एक गर्वीला एहसास देता है। चूंकि आप निगम के सर्वोच्च पद पर आसीन हैं इसलिए निगम के 48 वार्डों के लोग आपकी तरफ बड़ी उम्मीद भरी नजरों से देखते हैं और उनकी उम्मीदों पर खरा उतरना न केवल आपकी संवैधानिक जिम्मेदारी है बल्कि नैतिक जिम्मेदारी भी है। आप उस पर खरी उतरने का पूरा प्रयास कर भी रहीं है इसमें कोई दो राय नहीं है। फिर अचानक ऐसा क्या भूचाल आया कि आपके परस्पर विरोधाभाषी बयानों को लेकर मीडियावाले चटखारे लेने लग गए। आपसे पूर्व जो महापौर पद पर थीं वो किसी भी पार्टी से नहीं थी और उन्होंने अपना कार्यकाल किस तरह गुजारा कभी फुर्सत से उनसे बात कर पता कीजिएगा। आप तो पार्टी से हैं व सरकार भी आपकी पार्टी की है, हो सकता है पहली बार इतने बड़े पद का दायित्व संभालने को लेकर निगम के कार्यप्रणाली की जानकारी आपके पास न हो लेकिन आप ऐसी पहली महिला नहीं हैं। आपके साथ आपकी पार्टी है, बहुत से वरिष्ठ और अनुभवी पार्षद हैं और आशुतोष पाण्डेय जैसे कुशल प्रशासक। इन सभी अनुकूल परिस्थितियों के बावजूद विपक्षी दल ने अगर आपको अपने सवालों से घेरा है तो वह अस्वभाविक नहीं है। अस्वभाविक यह है कि आप अपने ही दल के पार्षदों के निशाने पर हैं। सवाल यह है कि ऐसी परिस्थिति निर्मित क्यों हुई? इस सवाल के जवाब के लिए हमें रायगढ़ नगर पालिका निगम के इतिहास में झांकने की जरूरत है।

बहुत गहरे नहीं हम पिछले महापौर के कार्यकाल तक झांकते हैं तो पता चलता है कि निगम में पार्षदों का ऐसा सिंडिकेट है जिसमें सभी पार्टी के चुनिंदा पार्षद शामिल हैं जिनका मकसद ही सफेद चूहों की तरह निगम के बजट को कुतरना होता है। इनमें से हर पार्षद की जेब में रूमाल की तरह दो-चार ठेकेदार खूसें रहते हैं और इन्हीं रूमालनुमा ठेकेदारों की मदद से टेंडर और सप्लाई का खेल खेला जाता है और आपसी सेटिंग से ठेकों की बंदरबांट कर ली जाती है। आपने अभी तक इस खेल का ककहरा भी नहीं जाना होगा और जनता से किए गए वादों को पूरा करने की दिशा में बगैर कुछ सोचे-समझे जुट गईं। इसलिए शुरुआती दौर में पार्षदों के सिंडिकेट ने आपको चने के झाड़ में चढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सरकारी और गैर-सरकारी मंचों पर सम्मानजनक जगह देकर आपको बहलाया गया और उसके बाद अपने निहित स्वार्थों को साधने के लिए आपका और आपके पद का दुरूपयोग करना शुरू किया तभी निगम आयुक्त आशुतोष पाण्डेय घुटे हुए पार्षदों के रास्ते पर रोड़े की तरह आ गए। आशुतोष पाण्डेय ने यह भांपने में चूक नहीं की कि आपको मोहरा बनाकर जो खेल खेला जा रहा है उसका रायगढ़ के विकास और जनहित के मुद्दे से कोई लेना-देना नहीं है। बहरहाल आपके छवि को धूमिल करने के लिए दूसरे हथकंडे अपनाए जाने लगे हैं। 

इस पूरे परिप्रेक्ष्य में अभी हाल के घटनाक्रम पर गौर करना होगा। जिसकी शुरुआत निगम के आयुक्त और सभापति के विवाद से शुरू होती है जब विवाद के दौरान सभापति यह कहते हैं कि उन्होंने चूडिय़ां नहीं पहन रखीं है लेकिन यह वार उल्टे उन्हीं पर ही पड़ता है और उनका गैर-जिम्मेदाराना कथन मीडिया की सुर्खियों में आ जाता है। अब विवाद की दिशा को बदलने के लिए एक पत्र सामने आ जाता है जिसमें महापौर उन पर दबाव बनाए जाने की बात कहती हैं उसके बाद इस संदर्भ में उनका खंडन भी आ जाता है। नाटक का सिलसिला एमआईसी के सदस्यों के खुद को महापौर से अलग करने के साथ आता है और उसके तत्काल बाद सभी गलबहियां डाले दिखते हैं। तभी विपक्ष इस पत्र को लपककर उठा लेता है और जांच की मांग करता है। यही नहीं सभापति जयंत ठेठवार विपक्ष से अपनी सहमति व्यक्त करते हैं।गजब का खेल चल रहा है निगम में। अब देखना है कि यह खेल कहां खत्म होता है। निगम आयुक्त के तबादले के साथ जिसके लिए हर सरकारी अधिकारी मानसिक रूप से तैयार रहता है या फिर एक बार आपको चूडिय़ों की तरह कमजोर साबित कर खुद को बाहुबली साबित करने तक।

आखिर में आपसे यही कहना चाहूंगी कि अगर आपको अपने पद, गरिमा और जिम्मेदारियों का एहसास है तो आत्मविश्वास से लबरेज होकर दृढ़ निश्चय के साथ आगे बढि़ए। और रायगढ़ को सबसे सुंदर मुकाम तक पहुंचाकर अपने कार्यकाल को एक मिसाल के तौर पर स्थापित करिए। रायगढ़वासियों की शुभकामनाएं आपके साथ रहेंगी, बता दीजिए महापौर जी कि चूडिय़ां कमजोर नहीं होती।

आशा त्रिपाठी, रायगढ़

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